दलाई लामा की जोखिम भरी यात्रा और भारत-चीन संबंधों में आया निर्णायक मोड़

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हिमालय के पार: दलाई लामा की रहस्यमयी पलायन गाथा और भारत-चीन रिश्तों की बदली दिशा

मार्च 1959 की एक ठंडी रात—ल्हासा की फ़िज़ा तोपों की गूंज से थर्रा रही थी। चीनी फौज तिब्बत की राजधानी को घेर चुकी थी, और ठीक उसी समय, एक युवा भिक्षु सैनिकों की वर्दी में चुपचाप अपने महल से निकल गया। ये कोई साधारण भिक्षु नहीं, बल्कि तिब्बत के आध्यात्मिक और राजनीतिक प्रमुख 14वें दलाई लामा थे।

उनकी मंज़िल केवल आज़ादी नहीं, ज़िंदा रहना भी थी। और यहीं से शुरू हुआ एक ऐसा सफर जिसने न सिर्फ हिमालयी भौगोलिक सीमाओं को लांघा, बल्कि भारत और चीन के रिश्तों की दशा-दिशा को भी बदल डाला।

❖ एक निमंत्रण जो खतरे का संकेत बन गया
1950 में तिब्बत पर चीनी कब्ज़े के बाद से ही तनाव लगातार बढ़ता रहा था। 1951 के 17-सूत्रीय समझौते में तिब्बत को “स्वायत्तता” देने का वादा किया गया था, मगर चीन के एकतरफा फैसलों और सैन्य मौजूदगी ने तिब्बतियों के भीतर गुस्सा भर दिया।

1959 में हालात उस समय विस्फोटक हो गए जब एक चीनी जनरल ने दलाई लामा को एक सैन्य मुख्यालय में सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण भेजा—लेकिन शर्त थी कि वे बिना सुरक्षा के आएं। इसे लेकर तिब्बती समाज में भय फैल गया। आशंका थी कि ये आमंत्रण असल में अपहरण या हत्या की साजिश है।

10 मार्च 1959 को लाखों तिब्बतियों ने दलाई लामा की सुरक्षा के लिए उनके महल नोरबुलिंगका के बाहर मानवीय दीवार बना दी। इस दिन को आज भी ‘तिब्बती विद्रोह दिवस’ के रूप में याद किया जाता है।

❖ रात के अंधेरे में शुरू हुआ पलायन
17 मार्च की रात दलाई लामा भिक्षु की वर्दी पहनकर, चुनिंदा साथियों और कुछ भरोसेमंद सैनिकों के साथ हिमालय की खामोश पगडंडियों पर निकल पड़े। उनके पास न नक्शा था, न तय रास्ता — केवल विश्वास और धैर्य।

हिमालय की ऊँचाई, बर्फीले दर्रे और दुर्गम घाटियाँ… हर कदम जोखिम से भरा था। फिर भी 13 दिन के कठिन सफर के बाद, 31 मार्च 1959 को वे भारत की सीमा में अरुणाचल प्रदेश के खेंजीमाने दर्रे से प्रवेश करने में सफल हुए।

❖ भारत में मानवीय शरण, लेकिन राजनयिक तूफान
असम राइफल्स ने दलाई लामा और उनके दल का स्वागत किया। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 3 अप्रैल को मानवीय आधार पर उन्हें शरण देने का फैसला किया, जो राजनयिक दृष्टि से बेहद साहसी कदम था।

तेजपुर में 18 अप्रैल को दलाई लामा ने प्रेस को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि वह अपनी इच्छा से भारत आए हैं, किसी दबाव में नहीं। उन्होंने चीन की आक्रामकता की निंदा की और भारत के आतिथ्य के लिए आभार जताया।

❖ भारत में निर्वासित तिब्बती जीवन की नींव
पहले मसूरी, फिर 1960 में दलाई लामा ने धर्मशाला को अपना स्थायी ठिकाना बनाया। यहां उन्होंने तिब्बती निर्वासित सरकार की स्थापना की, शिक्षा और संस्कृति के केंद्र बनाए और अपनी पहचान को फिर से खड़ा किया।

उनकी अहिंसा, संवाद और शांति की नीति के लिए उन्हें 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आज 90 वर्ष की उम्र में भी वे धर्मशाला में सक्रिय हैं, जहाँ ‘छोटा ल्हासा’ के रूप में एक नया तिब्बत पनप चुका है।

❖ भारत-चीन संबंधों पर पड़ा गहरा असर
भारत का यह मानवीय कदम, चीन को नागवार गुज़रा। उसने भारत पर तिब्बत मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाया। यह कूटनीतिक तनाव धीरे-धीरे 1962 के भारत-चीन युद्ध में बदल गया। दलाई लामा का भारत आना और शरण मिलना — यह दोनों देशों के संबंधों में एक स्थायी मोड़ बन गया।

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