बिहार में कांग्रेस बीते दो दशकों से राजद की सहयोगी रही है, लेकिन इस चुनाव में उसने अपनी अलग पहचान बनाने पर जोर दिया।
राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, मल्लिकार्जुन खरगे और केसी वेणुगोपाल जैसे शीर्ष नेता लगातार बिहार में सक्रिय दिखे। राहुल गांधी ने कई जनसभाओं में सीधे जनता से संवाद किया, जबकि प्रियंका गांधी की सभाओं में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी काफी रही। मल्लिकार्जुन खरगे ने संगठन की मजबूती पर जोर देते हुए संदेश दिया कि कांग्रेस अब किसी की परछाई नहीं बनेगी, बल्कि अपनी दिशा खुद तय करेगी।
पार्टी ने बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर केंद्रित कार्यक्रमों और रैलियों के जरिए युवाओं को जोड़ने की कोशिश की। राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा ने भी युवाओं से सीधे संवाद स्थापित किया। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भी कांग्रेस ने सक्रियता दिखाई और मीडिया में अपनी भूमिका मजबूती से पेश की। पार्टी का दावा है कि इस बार उसने केवल भाषणों पर भरोसा नहीं किया बल्कि जमीन से जुड़े कामों पर भी जोर दिया।
हालांकि, तमाम प्रयासों के बीच सबकी नजरें 14 नवंबर के नतीजों पर हैं। अगर कांग्रेस को अपेक्षित सीटें मिलती हैं, तो यह न केवल राज्य में उसकी स्थिति मजबूत करेगी, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी नेतृत्व के आत्मविश्वास को बढ़ाएगी। वहीं, अगर परिणाम उम्मीदों के अनुरूप नहीं आए, तो सवाल उठेंगे कि क्या कांग्रेस अब भी राजद की छाया में रहेगी या सचमुच अपने दम पर खड़ी होने का रास्ता तलाश पाएगी।
नतीजे चाहे जो भी हों, इस चुनाव ने बिहार में कांग्रेस के लिए अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद को स्पष्ट किया है, जो आने वाले वर्षों में पार्टी की दिशा और भविष्य तय करेगी।
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