जोशीमठ के बाद उत्तराखंड में नया खतरा! अब हेलंग और कल्पेश्वर की पहाड़ियां धंसने लगीं

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जोशीमठ में भू-धंसाव की चुनौती अभी पूरी तरह खत्म भी नहीं हुई है कि अब उत्तराखंड के हेलंग और कल्पेश्वर क्षेत्र की पहाड़ियों में भी धीमे-धीमे खिसकने के संकेत मिले हैं।

इस संबंध में किया गया एक वैज्ञानिक अध्ययन 22 जुलाई 2026 को प्रतिष्ठित जर्नल फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस में प्रकाशित हुआ है, जिसने इन इलाकों को लेकर नई चिंता बढ़ा दी है।

यह अध्ययन राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), राउरकेला की वैज्ञानिक प्रो. हेलिका दलाल और प्रो. भास्कर कुंडू ने किया। शोध में वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत द्वारा उपलब्ध कराए गए ‘जोश’ (JOSH) निरंतर जीपीएस स्टेशन के टाइम-सीरीज डेटा का भी उपयोग किया गया, जिससे निष्कर्षों की पुष्टि हुई।

सात वर्षों तक उपग्रह से हुई निगरानी

वैज्ञानिकों ने 2017 से 2023 के बीच यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-1 उपग्रह से प्राप्त 314 रडार चित्रों का विश्लेषण किया। इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार (InSAR) तकनीक की मदद से जमीन में मिलीमीटर से सेंटीमीटर स्तर तक होने वाले बदलावों को मापा गया। इसके अलावा वर्षा, भूजल भंडारण और सतही जल प्रवाह से जुड़े आंकड़ों का भी अध्ययन किया गया।

अलकनंदा और कल्पगंगा घाटियों की ओर सरक रही हैं ढलानें

अध्ययन में पाया गया कि हेलंग क्षेत्र की ढलानें धीरे-धीरे अलकनंदा घाटी की ओर, जबकि कल्पेश्वर क्षेत्र की पहाड़ियां कल्पगंगा घाटी की दिशा में खिसक रही हैं। वर्ष 2017 से 2023 के दौरान हेलंग में करीब 40 सेंटीमीटर और कल्पेश्वर में लगभग 20 सेंटीमीटर का संचयी विस्थापन दर्ज किया गया।

वैज्ञानिकों के अनुसार, नदियों द्वारा लगातार हो रहा कटाव, भारी वर्षा और पहाड़ों के भीतर जमा होने वाला पानी इस धीमे लेकिन लगातार जारी खिसकाव के प्रमुख कारण हैं।

‘धीमा भूस्खलन’ बना चिंता का विषय

शोधकर्ताओं ने इसे ‘धीमा भूस्खलन’ (Slow Landslide) बताया है। उनके अनुसार हर भूस्खलन अचानक नहीं होता। कई पहाड़ियां वर्षों तक बेहद धीमी गति से खिसकती रहती हैं। शुरुआत में इसका असर दिखाई नहीं देता, लेकिन समय के साथ जमीन में दरारें पड़ने लगती हैं, इमारतें झुकने लगती हैं और सड़कें क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। यदि यह प्रक्रिया तेज हो जाए तो बड़े भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है।

हर साल दोहराता है एक जैसा चक्र

अध्ययन में जोशीमठ, हेलंग और कल्पेश्वर क्षेत्र में लगभग 12 महीने का नियमित भूस्खलन चक्र भी दर्ज किया गया। मानसून के दौरान वर्षा का पानी पहाड़ के भीतर रिसकर चट्टानों और मिट्टी की परतों पर दबाव बढ़ाता है, जिससे ढलानों का खिसकना शुरू हो जाता है। स्पेक्ट्रल विश्लेषण के जरिए वैज्ञानिकों ने इस वार्षिक पैटर्न की पुष्टि की।

बारिश रुकने के बाद भी बना रहता है खतरा

शोध के अनुसार, भारी बारिश का असर तुरंत खत्म नहीं होता। सतह पर खिसकाव जल्दी दिखाई देता है, लेकिन पहाड़ के भीतर पानी जमा होने और उसका प्रभाव सामने आने में एक से तीन महीने तक का समय लग सकता है। यही वजह है कि कई बार बड़े भूस्खलन बारिश थमने के काफी समय बाद भी देखने को मिलते हैं।

जंगल घटे, निर्माण बढ़ा

अध्ययन में भूमि उपयोग में बदलाव का भी विश्लेषण किया गया। वर्ष 2000 से 2022 के बीच जोशीमठ, हेलंग और कल्पेश्वर क्षेत्र में निर्मित क्षेत्र लगभग 0.7 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 3 वर्ग किलोमीटर हो गया, जबकि वन क्षेत्र 8.5 वर्ग किलोमीटर से घटकर 7.5 वर्ग किलोमीटर रह गया।

वैज्ञानिकों का कहना है कि जहां वनस्पति कम हुई, वहां जमीन में विकृति अधिक दर्ज की गई। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि भूस्खलन के लिए केवल यही एक कारण जिम्मेदार नहीं है, बल्कि भूगर्भीय संरचना, वर्षा, जल संचयन और मानवीय गतिविधियां मिलकर इस समस्या को बढ़ा रही हैं।

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