लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर मतदाता सूची में कथित हेरफेर का आरोप लगाया है।
उन्होंने कहा कि समय आने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और ज्ञानेश कुमार को कथित मामले में सरकारी गवाह बनने की सलाह दी।
राहुल गांधी पहले भी चुनाव आयोग को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उनके पुराने आरोपों के बीच द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों का जिक्र सामने आया। इसके बाद विपक्ष ने अपने आरोपों को दोहराते हुए CEC के खिलाफ कार्रवाई की मांग तेज कर दी है।
हालांकि, गिरफ्तारी की मांग के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को कानून के तहत मिली सुरक्षा का मुद्दा भी सामने आया है। इसी को लेकर अब यह सवाल उठ रहा है कि CEC के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई किस स्थिति में शुरू की जा सकती है।
क्या कहती है धारा 16?
2023 में लागू हुए मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम की धारा 16 चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों से जुड़े मामलों में कानूनी सुरक्षा प्रदान करती है। प्रावधान के तहत मौजूदा या पूर्व CEC अथवा चुनाव आयुक्त के खिलाफ उनके पद पर रहते हुए आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में किए गए किसी कार्य को लेकर सिविल या आपराधिक कार्यवाही शुरू करने या जारी रखने पर रोक का प्रावधान है।
यही प्रावधान CEC की गिरफ्तारी की मांग के बीच कानूनी बहस का प्रमुख आधार बन गया है। हालांकि, धारा 16 की व्याख्या और इसका दायरा अदालतों के समक्ष चुनौती का विषय बना हुआ है।
कानून बनने की पृष्ठभूमि क्या है?
2023 में सुप्रीम कोर्ट के अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले के बाद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर संसद ने कानून बनाया। सुप्रीम कोर्ट ने संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति के जरिए नियुक्ति की अंतरिम व्यवस्था तय की थी।
बाद में संसद द्वारा पारित कानून में CJI को चयन समिति से बाहर कर दिया गया और उनकी जगह केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया। इस बदलाव को लेकर विपक्ष ने आपत्ति जताई है। हाल की अदालती सुनवाई में भी चयन व्यवस्था और कानून के विभिन्न प्रावधानों को लेकर सवाल उठे हैं।
धारा 16 को लेकर क्या विवाद है?
कानून में चुनाव आयुक्तों को मिली सुरक्षा को लेकर भी अदालत में चुनौती दी गई है। एक याचिका में तर्क दिया गया है कि मतदाता सूची में कथित छेड़छाड़ जैसे आरोपों को आधिकारिक चुनावी कर्तव्य के दायरे में नहीं माना जाना चाहिए और इसलिए ऐसे मामलों में धारा 16 की सुरक्षा लागू नहीं होनी चाहिए।
याचिकाकर्ता ने CEC के खिलाफ जांच और आपराधिक कार्रवाई की मांग की है। इसमें जन प्रतिनिधित्व अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता के विभिन्न प्रावधानों का हवाला दिया गया है। दूसरी ओर, धारा 16 के समर्थकों का तर्क है कि चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक फैसलों को लेकर मुकदमों से सुरक्षा देना चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जरूरी है।
संसद में भी उठ चुका है मुद्दा
दिसंबर 2025 में संसद में इस मुद्दे पर हुई बहस के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि चुनाव अधिकारियों को चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मामलों में कानूनी सुरक्षा देने वाले प्रावधान पहले से मौजूद कानूनों के अनुरूप हैं। राहुल गांधी ने इस तर्क पर असहमति जताई थी और धारा 16 को लेकर अपनी आपत्ति दोहराई थी।
विपक्षी दलों ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठाए हैं। वहीं बीजेपी ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि कांग्रेस अपनी चुनावी हार के बाद लगातार ऐसे आरोप लगा रही है।
सुप्रीम कोर्ट में भी चल रही है चुनौती
चुनाव आयुक्तों को मिली कानूनी सुरक्षा के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। धारा 16 को चुनौती देने वाली याचिका पर अदालत ने अब तक इस प्रावधान पर रोक नहीं लगाई है।
23 सितंबर को इस मामले से जुड़ी सुनवाई में दो न्यायाधीशों की पीठ के विभाजित फैसले के बाद मामला आगे की सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया। इससे 2023 के कानून और चुनाव आयुक्तों को मिली कानूनी सुरक्षा को लेकर चल रही संवैधानिक बहस फिर केंद्र में आ गई है।
विपक्ष के आरोप और बीजेपी का जवाब
राहुल गांधी के अलावा समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल और तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी समेत कई विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूचियों में कथित हेरफेर को लेकर सवाल उठाए हैं। विपक्ष ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने का भी मुद्दा उठाया है।
हालांकि, मतदाता सूची में जानबूझकर हेरफेर किए जाने के आरोपों को बीजेपी और चुनाव आयोग की ओर से खारिज किया गया है। ऐसे में CEC की कानूनी सुरक्षा, चुनाव आयोग की जवाबदेही और मतदाता सूची से जुड़े आरोपों की जांच का मुद्दा अब राजनीतिक के साथ-साथ कानूनी बहस का भी हिस्सा बन गया है।
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