ईरान और इजरायल के बीच जारी संघर्ष ने पश्चिम एशिया की राजनीति और शक्ति संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है।
इस टकराव में जहां इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू घरेलू मोर्चे पर मजबूत होते नजर आ रहे हैं, वहीं अमेरिका और खाड़ी देशों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
नेतन्याहू को मिला राजनीतिक लाभ
इजरायल के लिए यह लड़ाई सुरक्षा और अस्तित्व से जुड़ी बताई जा रही है। इस संघर्ष ने देश के भीतर राजनीतिक फोकस को गाजा से हटाकर सीधे ईरान पर केंद्रित कर दिया है, जिससे नेतन्याहू को व्यापक जनसमर्थन मिला है। मौजूदा हालात में वे एक सख्त और निर्णायक नेता की छवि बनाने में सफल रहे हैं।
अमेरिका की रणनीति पर सवाल
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुरुआत में दबाव बनाकर ईरान को झुकाने की रणनीति अपनाई थी, लेकिन ईरान के कड़े रुख ने हालात को उलझा दिया है। अब अमेरिका एक ऐसे संघर्ष में उलझा दिख रहा है, जहां स्पष्ट निकास रणनीति नजर नहीं आती।
अमेरिकी आकलनों के अनुसार, ईरान पर दबाव जरूर पड़ा है, लेकिन उसकी सैन्य क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और वह जवाबी कार्रवाई करने में सक्षम बना हुआ है।
खाड़ी देशों पर बढ़ता दबाव
इस युद्ध का सबसे सीधा असर खाड़ी देशों पर पड़ रहा है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी मार्ग से होता है, ऐसे में किसी भी बाधा का असर सीधे वैश्विक बाजार पर पड़ सकता है।
खाड़ी देश, जो खुद को निवेश और व्यापार के बड़े केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, अब सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को लेकर असमंजस में हैं।
सैन्य बढ़त, लेकिन चुनौतियां बरकरार
संघर्ष के दौरान इजरायल ने ईरान से जुड़े कई रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाकर अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया है। वहीं अमेरिका क्षेत्र में ईरान की नौसैनिक ताकत को सीमित करने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में इजरायल और अमेरिका के बीच रणनीतिक मतभेद भी सामने आए हैं, जिससे दोनों देशों के तालमेल पर सवाल उठने लगे हैं।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू की राजनीतिक बढ़त इस बात पर निर्भर करेगी कि यह संघर्ष किस दिशा में जाता है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है या क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ती है, तो यह बढ़त उनके लिए बोझ भी बन सकती है।
कुल मिलाकर, यह युद्ध सिर्फ सैन्य टकराव नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित करने वाला बड़ा मोड़ बन चुका है।
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