SIR पर सियासी घमासान के बीच आंकड़ों पर बहस, 13 करोड़ नामों में कितने मतदाता वास्तव में जांच के दायरे में?
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक विवाद लगातार जारी है। विपक्ष चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर सवाल उठा रहा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट में भी SIR की प्रक्रिया से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई जारी है। इसी बीच मतदाता सूची से जुड़े करीब 13 करोड़ नामों के आंकड़े को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
SIR की प्रक्रिया पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के अधिकार और मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े कई पहलुओं पर विचार किया। 27 मई 2026 के फैसले में अदालत ने माना कि चुनाव आयोग को SIR कराने का अधिकार है और मतदाता सूची को लेकर आयोग नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है।
13 करोड़ के आंकड़े को लेकर क्या है दावा?
SIR के दौरान सामने आए करीब 13.3 करोड़ नामों को लेकर विपक्ष की ओर से सवाल उठाए गए हैं। वहीं, चुनाव आयोग से जुड़े आंकड़ों के आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि इस संख्या का बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों का है जिनकी मृत्यु हो चुकी है, जो स्थायी रूप से दूसरी जगह चले गए हैं या जिनके नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज हैं।
दावे के मुताबिक, करीब 2.8 करोड़ ऐसे मतदाता हैं जिनकी पिछले दो दशकों में मृत्यु हो चुकी है। इसके अलावा एक करोड़ से अधिक नाम डुप्लीकेट बताए गए हैं। करीब 6.5 करोड़ लोगों के स्थायी रूप से दूसरी जगह चले जाने की बात भी सामने आई है।
चुनाव आयोग के अनुसार, करीब तीन करोड़ लोग ऐसे थे जो SIR के दौरान अपने दर्ज पते पर मौजूद नहीं मिले। इसके अलावा कुछ मतदाताओं को आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा पाने के कारण नोटिस भी जारी किए गए।
दोबारा होगी करीब तीन करोड़ मतदाताओं की जांच
चुनाव आयोग ने कहा है कि 20 राज्यों में उन मतदाताओं की दोबारा जांच की जाएगी जिन्हें नोटिस जारी किया गया था या जिनके नाम अंतिम मतदाता सूची से बाहर किए गए हैं। इस प्रक्रिया के जरिए उन लोगों को अपनी पात्रता साबित करने का अवसर मिलेगा, जिनके नाम को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
इस आधार पर 13 करोड़ के आंकड़े को लेकर यह तर्क दिया जा रहा है कि पूरी संख्या को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। अलग-अलग कारणों से सूची से बाहर हुए या जांच के दायरे में आए मतदाताओं की स्थिति अलग-अलग है।
सुप्रीम कोर्ट ने SIR की वैधता पर क्या कहा?
बिहार में SIR कराने की चुनाव आयोग की 24 जून 2025 की अधिसूचना के बाद इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई थीं। याचिकाओं में इसे असंवैधानिक बताते हुए प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने लंबी सुनवाई के दौरान SIR पर रोक नहीं लगाई। हालांकि, अदालत ने प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और मतदाताओं के लिए सुगम बनाने के उद्देश्य से कई प्रक्रियात्मक निर्देश जारी किए। बाद में पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़ा मामला भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, लेकिन वहां भी प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई गई।
27 मई 2026 के फैसले में अदालत ने मुख्य रूप से चार सवालों पर विचार किया था—क्या चुनाव आयोग के पास SIR कराने का अधिकार है, क्या इसका उद्देश्य वैध है, क्या अपनाई गई प्रक्रिया उस उद्देश्य के अनुरूप है और क्या यह जनप्रतिनिधित्व कानून तथा मतदाता पंजीकरण नियमों के प्रावधानों के अनुरूप है।
अदालत ने यह भी विचार किया कि क्या मतदाता सूची में नाम शामिल करने या बनाए रखने के संदर्भ में चुनाव आयोग नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है। फैसले में अदालत ने माना कि आयोग के पास SIR कराने की शक्ति है और मतदाता सूची तैयार करने के दौरान नागरिकता से जुड़े पहलुओं की सीमित जांच की जा सकती है।
विवाद अभी भी क्यों जारी है?
हालांकि सुप्रीम कोर्ट SIR की वैधानिकता से जुड़े प्रमुख सवालों पर अपना फैसला सुना चुका है, लेकिन प्रक्रिया से संबंधित कुछ अन्य याचिकाएं अभी भी अदालत के समक्ष लंबित हैं। इन मामलों में SIR की प्रणालीगत और प्रक्रियात्मक व्यवस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई हो रही है।
इसी बीच विपक्ष SIR को लेकर अपनी आपत्तियां लगातार उठा रहा है। ऐसे में 13 करोड़ के आंकड़े की व्याख्या और उनमें वास्तव में जांच के दायरे में आने वाले मतदाताओं की संख्या को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है।
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