एल-नीनो की बढ़ती ताकत ने बढ़ाई चिंता, रिकॉर्ड तोड़ने की आशंका; भारत में कमजोर पड़ सकता है मानसून
दुनिया भर के जलवायु वैज्ञानिक तेजी से मजबूत हो रहे एल-नीनो को लेकर चिंतित हैं। ताजा जलवायु मॉडल संकेत दे रहे हैं कि यह घटना आधुनिक इतिहास के सबसे शक्तिशाली एल-नीनो में से एक साबित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर सिर्फ तापमान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में हीटवेव, बाढ़, सूखा और भीषण तूफानों का खतरा भी बढ़ सकता है।
रिकॉर्ड तोड़ सकता है 2026 का एल-नीनो
अमेरिका की नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने पुष्टि की है कि प्रशांत महासागर में एल-नीनो की स्थिति विकसित हो चुकी है। अधिकांश मौसमी जलवायु मॉडल बताते हैं कि यह 2026 के आखिर तक और मजबूत होगा तथा उत्तरी गोलार्ध की सर्दियों में अपने चरम पर पहुंच सकता है।
जलवायु वैज्ञानिक जेक हॉसफादर के विश्लेषण के अनुसार, 14 मौसमी जलवायु मॉडलों के 667 पूर्वानुमानों में संकेत मिला है कि इस बार का एल-नीनो 1982-83, 1997-98 और 2015-16 जैसी ऐतिहासिक घटनाओं से भी ज्यादा ताकतवर हो सकता है।
क्या कहते हैं आंकड़े?
पूर्वानुमानों के मुताबिक नीनो 3.4 एनोमली लगभग 3.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकती है। तुलना करें तो 2015-16 के सुपर एल-नीनो के दौरान इसका उच्चतम स्तर 2.75 डिग्री सेल्सियस था। 90 प्रतिशत से अधिक मॉडल इस बार के एल-नीनो के रिकॉर्ड तोड़ने की संभावना जता रहे हैं।
NOAA के दैनिक समुद्री सतह तापमान (OISST v2.1) के विश्लेषण के अनुसार, 13 जुलाई तक नीनो 3.4 एनोमली करीब 2.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज की गई, जो साल के इस समय के लिए सैटेलाइट रिकॉर्ड (1982 से) में अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।
इसके मुकाबले 1997 के सुपर एल-नीनो में इसी अवधि के दौरान यह आंकड़ा करीब 1.6 डिग्री, जबकि 2015 में 1.3 डिग्री सेल्सियस था। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी तेज बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि यह एल-नीनो पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से विकसित हो रहा है।
दुनिया पर क्या होगा असर?
अगर मौजूदा अनुमान सही साबित होते हैं तो आने वाले महीनों में कई देशों में रिकॉर्डतोड़ गर्मी, लंबे सूखे, अचानक बाढ़ और उष्णकटिबंधीय तूफानों की घटनाएं बढ़ सकती हैं। एल-नीनो वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करता है, इसलिए इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप में देखने को मिल सकता है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता कमजोर मानसून है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) पहले ही 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए बारिश का अनुमान लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का 90 प्रतिशत लगा चुका है।
मौसम विभाग के अनुसार, इस बार इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) के न्यूट्रल रहने की संभावना है। ऐसे में एल-नीनो के असर को संतुलित करने वाला कोई मजबूत प्राकृतिक कारक मौजूद नहीं होगा।
इसका असर मानसून पर पहले ही दिखने लगा है। जून में देशभर में सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम बारिश हुई, जबकि जुलाई में भी अब तक लगभग 19 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है। इससे पूरे मानसून सीजन में बारिश की कुल कमी बढ़कर 23 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
खेती पर भी दिखने लगा असर
कमजोर मानसून का असर खरीफ फसलों की बुआई पर भी दिखाई दे रहा है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, 10 जुलाई 2026 तक खरीफ फसलों की बुआई 531.25 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि सामान्य रकबा 549.36 लाख हेक्टेयर है। यह पिछले पांच वर्षों के औसत से भी करीब 3 प्रतिशत कम है।
सबसे अधिक चिंता धान की बुआई को लेकर है। अब तक धान की सामान्य मौसमी बुआई का केवल 28 प्रतिशत क्षेत्र ही कवर हो पाया है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में करीब 9 प्रतिशत कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले हफ्तों में मानसून में सुधार नहीं हुआ, तो इसका असर कृषि उत्पादन और खाद्य आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।
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