बारामती में पवार बनाम पवार: मालेगांव सहकारी चीनी मिल चुनाव में अजित पवार का दबदबा
महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर चाचा-भतीजा की जंग की गवाह बनी, और इस बार रणभूमि थी बारामती की मालेगांव सहकारी चीनी मिल। उपमुख्यमंत्री अजित पवार के ‘नीलकंठेश्वर पैनल’ ने अपने चाचा शरद पवार के ‘बलिराजा पैनल’ को करारी शिकस्त दी। कुल 21 सीटों में से 20 पर अजित पवार गुट ने जीत दर्ज की, जबकि शरद पवार के सभी उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा।
यह हार शरद पवार के लिए इसलिए भी बड़ा झटका मानी जा रही है क्योंकि यह मुकाबला उनके राजनीतिक गढ़ बारामती में हुआ, जहां दशकों तक उनका प्रभाव निर्विवाद रहा है। इस बार खुद अजित पवार ने 40 साल बाद सीधे चुनाव लड़ा और विजयी हुए।
‘बलिराजा पैनल’ के जरिए शरद पवार की अगुवाई वाली एनसीपी ने एक बार फिर पारिवारिक एकता के संकेत दिए, लेकिन नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अजित पवार की पकड़ अब स्थानीय राजनीति में कहीं ज्यादा मजबूत हो चुकी है।
मालेगांव मिल का चुनाव इसलिए भी अहम था क्योंकि यह सहकारी संस्था न केवल क्षेत्र की अर्थव्यवस्था से जुड़ी है, बल्कि हजारों किसानों और कर्मचारियों के जीवन पर भी सीधा असर डालती है। इस चुनाव में 90 उम्मीदवार मैदान में थे और करीब 19,600 मतदाताओं ने मतदान किया।
अजित पवार ने चुनाव प्रचार के दौरान फैक्ट्री को ₹500 करोड़ की आर्थिक मदद का वादा किया था और 15 से अधिक रैलियों में हिस्सा लिया। उनका यह आक्रामक प्रचार अभियान रंग लाया, और नतीजों ने उन्हें मजबूत जनसमर्थन का संकेत दिया।
महाराष्ट्र की राजनीति में सहकारी चीनी मिलों का हमेशा से खास स्थान रहा है। ये नतीजे न सिर्फ पवार परिवार के भीतर सत्ता संतुलन को दर्शाते हैं, बल्कि राज्य की राजनीतिक दिशा पर भी असर डाल सकते हैं — खासकर तब, जब एनसीपी दो धड़ों में बंटी हुई है और बीजेपी की निगाहें बारामती जैसे गढ़ पर टिकी हैं।
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