बिहार SIR मामले में चुनाव आयोग का हलफनामा: फर्जी मतदाता हटाना संवैधानिक जिम्मेदारी
बिहार में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) मामले को लेकर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल किया है। आयोग ने विपक्षी दलों—कांग्रेस, राजद और एडीआर—द्वारा लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए SIR प्रक्रिया का मजबूती से बचाव किया है। आयोग ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत आयोग को प्राप्त अधिकारों के अनुरूप है और इसका मकसद मतदाता सूची को शुद्ध और निष्पक्ष बनाना है।
फर्जी मतदाता हटाना हमारी संवैधानिक जिम्मेदारी: आयोग
चुनाव आयोग ने कहा कि मतदाता सूची से फर्जी नामों को हटाना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है, और वह इसे पूरी पारदर्शिता के साथ निभा रहा है। आयोग ने बताया कि SIR की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है और 90% से अधिक मतदाताओं ने पहले ही अपने गणना फॉर्म जमा कर दिए हैं।
दलितों, गरीबों और हाशिए पर मौजूद वर्गों को मिलेगी पूरी सुरक्षा
आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी भी पात्र मतदाता को सूची से बाहर नहीं किया जाएगा। विशेष रूप से वंचित तबकों — जैसे गरीबों, हाशिए पर रहने वाले लोगों — को ध्यान में रखते हुए यह प्रक्रिया चलाई जा रही है। आयोग ने यह भी कहा कि पहली बार इतनी बड़ी संख्या में राजनीतिक दलों ने SIR प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी की है। लगभग डेढ़ लाख बीएलए (Booth Level Agents) इस अभियान में बीएलओ (Booth Level Officers) के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के सवालों के मिले स्पष्ट जवाब
हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए सभी बिंदुओं का जवाब दिया गया है। आयोग ने बताया कि SIR के लिए निर्धारित समय सीमा से पहले ही 96% से अधिक गणना फॉर्म एकत्रित किए जा चुके हैं। साथ ही, चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और समयबद्धता बनाए रखने के लिए 1 लाख से अधिक बीएलओ, 1.5 लाख बीएलए और 1 लाख स्वयंसेवक काम में लगे हैं।
‘याचिकाकर्ता साफ हाथों से नहीं आए कोर्ट’
चुनाव आयोग ने हलफनामे में यह भी तर्क दिया कि याचिका दाखिल करने वाले कुछ राजनीतिक दलों के नेता स्वयं जनप्रतिनिधि हैं, और वे पूरी निष्पक्षता के साथ कोर्ट में नहीं आए हैं। आयोग ने मीडिया के एक हिस्से में फैलाई जा रही भ्रामक जानकारियों पर भी आपत्ति जताई है।
अब इस मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में होगी।
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