पश्चिम बंगाल की चुनावी सरगर्मी के बीच Mamata Banerjee की रैली एक खास राजनीतिक और सांस्कृतिक रंग लिए नजर आती है।
रैली शुरू होने से पहले ही मंच पर मौजूद स्थानीय नेता अपने भाषणों में एक ही सुर छेड़ते हैं—“जय बांग्ला”। यही नारा पूरे माहौल की धुरी बन जाता है। “जय बांग्ला” के साथ “जय बंगाल” और फिर ममता बनर्जी व Abhishek Banerjee के समर्थन में नारे गूंजते हैं।
ममता के आने से पहले माहौल पूरी तरह तैयार हो चुका होता है। हेलिकॉप्टर के पहुंचने से ठीक पहले मंच से घोषणा होती है कि दीदी के स्वागत में सफेद टोपी लहराई जाए। जैसे ही हेलिकॉप्टर की आवाज गूंजती है, भीड़ में उत्साह चरम पर पहुंच जाता है।
स्टेज तक जाने वाले रास्ते में पारंपरिक अंदाज में महिलाएं ढोल और घंटियां लेकर खड़ी रहती हैं। बैकग्राउंड में “फाइटर दीदी” गीत बजता है, जिस पर महिलाएं नाचती दिखती हैं। इस बार “खेला होबे” का नारा और गाना नदारद रहता है, जो पिछले चुनाव में बेहद चर्चित था।
मंच पर पहुंचते ही ममता बनर्जी पूरा नियंत्रण संभाल लेती हैं। वह उम्मीदवारों का परिचय कराती हैं और फिर “जय बांग्ला” के नारों के बीच अपना भाषण शुरू करती हैं। उनका अधिकांश संबोधन बांग्ला में होता है, लेकिन बीच-बीच में हिंदी का इस्तेमाल भी करती हैं, जिससे व्यापक दर्शकों तक संदेश पहुंचे।
अपने भाषण में ममता बनर्जी स्थानीय भावनाओं को साधने की पूरी कोशिश करती हैं। मछली—जो बंगाल की संस्कृति और खानपान का अहम हिस्सा है—का जिक्र करते हुए वह दावा करती हैं कि अगर बीजेपी सत्ता में आई तो मछली बेचने तक पर रोक लग सकती है।
सांस्कृतिक संदर्भों के जरिए भी वह जनता से जुड़ती हैं। Rabindranath Tagore, Bankim Chandra Chattopadhyay और Kazi Nazrul Islam जैसे महान साहित्यकारों का उल्लेख करते हुए उनकी रचनाओं का पाठ करती हैं। साथ ही दुर्गा पाठ, काली मां का स्मरण और शिव स्तुति भी उनके भाषण का हिस्सा बनते हैं।
वह अपनी सरकार की योजनाओं, खासकर “लक्ष्मी भंडार” योजना का जिक्र करते हुए महिलाओं से संवाद करती हैं और केंद्र सरकार पर परिसीमन के बहाने राज्य को बांटने की कोशिश का आरोप भी लगाती हैं।
भाषण के अंत में उनका अंदाज पूरी तरह भावनात्मक और जोशीला होता है—“बोलबो रे, लड़बो रे, कोरबो रे, जीतबो रे…” के साथ वह समर्थकों में ऊर्जा भरती हैं।
रैली के समापन पर वह उन महिलाओं को मंच पर बुलाती हैं, जिन्होंने पारंपरिक वाद्ययंत्रों से उनका स्वागत किया था, और खुद भी घंटी बजाकर माहौल में शामिल हो जाती हैं।
पूरी रैली एक तरह से बांग्ला भाषा, संस्कृति और राजनीतिक संदेश का मिश्रण होती है—ऐसी कि अगर कोई हिंदी भाषी दर्शक भी वहां मौजूद हो, तो उसे यह एक “बांग्ला मास्टरक्लास” जैसा अनुभव लगे। शुरुआत “जय बांग्ला” से होती है और अंत भी उसी नारे के साथ होता है।
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