सबरीमला केस: ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ तय करने से कोर्ट बचे — मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने Supreme Court of India से कहा है कि अदालतों को यह तय करने से बचना चाहिए कि किसी धर्म में क्या ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ है। बोर्ड ने इस संबंध में अपनी लिखित दलीलें सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की हैं। इस मामले की सुनवाई 7 अप्रैल से नौ जजों की संविधान पीठ करेगी।
सबरीमला मामले में बोर्ड की दलील
बोर्ड ने कहा कि किसी धार्मिक प्रथा को ‘आवश्यक’ मानना या न मानना अदालतों के अधिकार क्षेत्र से बाहर होना चाहिए। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिली धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप हो सकता है। यह दलील 2018 के सबरीमला फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं के संदर्भ में दी गई है।
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। इसके बाद 2019 में कोर्ट ने इस मामले से जुड़े बड़े संवैधानिक सवालों को नौ जजों की पीठ को सौंप दिया था।
‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ तय करना जटिल
बोर्ड ने अपनी दलील में कहा कि किसी धर्म की मूल या आवश्यक प्रथाओं का निर्धारण बेहद जटिल और आस्था से जुड़ा विषय है। इसलिए यह जिम्मेदारी अदालतों के बजाय धार्मिक विद्वानों और संबंधित समुदाय पर छोड़ी जानी चाहिए।
साथ ही बोर्ड ने यह भी कहा कि ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ की कसौटी के तहत लोगों पर यह बोझ डाल दिया जाता है कि वे साबित करें कि कोई प्रथा उनके धर्म के लिए अनिवार्य है, जो उचित नहीं है।
नैतिकता और आस्था में संतुलन जरूरी
बोर्ड ने कोर्ट से आग्रह किया कि नैतिकता को केवल संवैधानिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि संबंधित धर्म की मान्यताओं के साथ भी देखा जाना चाहिए—जब तक वे संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ न हों।
इसके अलावा, बोर्ड ने कहा कि महिला अधिकार और धार्मिक आस्था को एक-दूसरे के विरोध में नहीं देखा जाना चाहिए। एक महिला अपनी स्वतंत्रता के साथ अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन भी कर सकती है।
समानता का मतलब ‘एक जैसा नियम’ नहीं
बोर्ड ने तर्क दिया कि सभी धर्मों पर एक जैसा नियम लागू करना हर बार समानता नहीं लाता, क्योंकि अलग-अलग धर्मों की परंपराएं अलग होती हैं।
बोर्ड ने यह भी कहा कि ‘पब्लिक ऑर्डर’ या सेक्युलर नियमों के नाम पर बिना ठोस कारण धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।
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