अफगानिस्तान में तालिबान का नया कानून, महिलाओं के अधिकारों पर फिर संकट

1

अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। सत्ता में मौजूद Taliban ने एक नई दंड प्रक्रिया संहिता लागू की है, जिसे लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता जताई जा रही है। रिपोर्टों के मुताबिक इस कानून को तालिबान के सर्वोच्च नेता Hibatullah Akhundzada की मंजूरी के बाद लागू किया गया।

कानून को लेकर क्या है विवाद?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नए प्रावधानों में घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में सजा का दायरा बेहद सीमित बताया गया है। अगर शारीरिक हिंसा से गंभीर चोट या हड्डी टूटने जैसे स्पष्ट सबूत नहीं मिलते, तो आरोपी को मामूली सजा हो सकती है। यहां तक कि गंभीर चोट की स्थिति में भी अधिकतम 15 दिन की जेल का प्रावधान बताया जा रहा है।

सजा तभी दी जाएगी जब पीड़िता अदालत में हिंसा को साबित कर पाए। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि महिला को अदालत में अपनी चोटें दिखाने के लिए पूरी तरह ढका हुआ रहना होगा और उसके साथ पति या कोई पुरुष अभिभावक की मौजूदगी जरूरी होगी।

इसके अलावा, प्रावधानों में यह भी उल्लेख है कि यदि कोई विवाहित महिला पति की अनुमति के बिना रिश्तेदारों के घर जाती है, तो उसे जेल की सजा हो सकती है।

सामाजिक हैसियत के आधार पर सजा?

कानून के अनुच्छेद 9 को लेकर भी विवाद है। बताया जा रहा है कि इसमें समाज को चार वर्गों—उलेमा (धार्मिक विद्वान), उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और निचला वर्ग—में बांटकर सजा तय करने का प्रावधान किया गया है। आरोप है कि अपराध की सजा उसकी गंभीरता के बजाय आरोपी की सामाजिक स्थिति के आधार पर तय होगी।

गंभीर अपराधों में दी जाने वाली शारीरिक सजा इस्लामी मौलवी देंगे. यह नया 90 पन्नों का दंड संहिता कानून 2009 के महिलाओं के खिलाफ हिंसा खत्म करने वाले कानून को खत्म कर देता है. वह कानून पहले अमेरिका समर्थित सरकार के समय लाया गया था.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यदि कोई धार्मिक विद्वान अपराध करता है तो उसे केवल चेतावनी दी जाएगी, जबकि उच्च वर्ग के व्यक्ति को अदालत में बुलाकर सलाह दी जा सकती है। मध्यम वर्ग के व्यक्ति को जेल और निचले वर्ग के व्यक्ति को जेल के साथ शारीरिक दंड का सामना करना पड़ सकता है।

आलोचना और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

ब्रिटिश अखबार The Independent की रिपोर्ट के अनुसार, मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि लोग इस कानून के खिलाफ बोलने से भी डर रहे हैं। बताया गया है कि तालिबान ने कानून पर सार्वजनिक चर्चा को भी अपराध घोषित कर दिया है।

अफगान मानवाधिकार संगठन Rawadari, जो देश से बाहर रहकर काम करता है, ने संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अपील की है कि इस संहिता को तत्काल प्रभाव से रोका जाए।

महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिनिधि Reem Alsalem ने सोशल मीडिया मंच X पर लिखा कि इस कानून का असर बेहद गंभीर हो सकता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस पर स्पष्ट और ठोस कदम उठाने की मांग की है।

कुल मिलाकर, इस नए कानून को लेकर अफगानिस्तान में महिलाओं की सुरक्षा और समान अधिकारों पर गहरी चिंता व्यक्त की जा रही है, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया पर भी नजरें टिकी हैं।

Comments are closed.