हाल ही में रिलीज हुई फिल्म बॉर्डर 2 ने 1971 के भारत–पाक युद्ध की वीर गाथाओं को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।
यह फिल्म पाकिस्तान के खिलाफ बसंतर की ऐतिहासिक लड़ाई में शामिल भारतीय सैनिकों पर आधारित है। इस युद्ध में सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल और पूना हॉर्स के तत्कालीन कमांडर लेफ्टिनेंट कर्नल (बाद में लेफ्टिनेंट जनरल) हनुत सिंह के साथ एक और अधिकारी ने असाधारण साहस दिखाया—मेजर (बाद में ब्रिगेडियर) अमरजीत सिंह बल। उन्होंने अपने सेंटूरियन टैंक के साथ दुश्मन का सीधा मुकाबला किया और बसंतर नदी पर जरपाल ब्रिजहेड को सुरक्षित किया। ‘मंडे मोटिवेशन’ में जानते हैं मेजर बल की कहानी।
घुड़सवार रेजिमेंट से टैंकों तक का सफर
अमरजीत सिंह बल को भारतीय सेना की प्रतिष्ठित पूना हॉर्स रेजिमेंट में कमीशन मिला था। यह रेजिमेंट कभी घुड़सवार दस्ते के रूप में जानी जाती थी, जिसने समय के साथ खुद को आधुनिक युद्ध के अनुरूप ढालते हुए टैंकों को अपनाया। पूना हॉर्स को राष्ट्रमंडल में सबसे अधिक युद्ध सम्मान प्राप्त करने का गौरव हासिल है। भारतीय सेना इसे ‘वीरतम वीर’ कहती है, जबकि पाकिस्तान में इसे ‘फख्र-ए-हिंद’ के नाम से जाना जाता है।
1971 में पैटन टैंकों से टकराव
एनडीटीवी में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, 1971 के युद्ध के समय अमरजीत सिंह बल महज 31 वर्ष की उम्र में मेजर थे और स्क्वाड्रन कमांडर की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। 3 दिसंबर को युद्ध शुरू होने के बाद पूना हॉर्स को पश्चिमी मोर्चे पर तैनात किया गया। यूनिट को पाकिस्तान के शकड़गढ़ उभार पर कब्जा करने का आदेश मिला, ताकि जम्मू और पंजाब के बीच सड़क संपर्क सुरक्षित किया जा सके। रेजिमेंट ने 4 दिसंबर से लगातार 12 दिनों तक भीषण लड़ाई लड़ी। 16 दिसंबर को उन्हें पाकिस्तान की 13वीं लांसर्स रेजिमेंट के जवाबी हमलों का सामना करना पड़ा, जो आधुनिक एम-48 पैटन टैंकों से लैस थी।
संख्या कम, हौसला बुलंद
मेजर बल ‘बी’ (ब्रावो) स्क्वाड्रन की कमान संभाल रहे थे, जबकि 21 वर्षीय सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल ‘ए’ (अल्फा) स्क्वाड्रन में थे। 15–16 दिसंबर की रात पूना हॉर्स को बिना पूरी तरह साफ किए गए बारूदी सुरंग क्षेत्र से होते हुए बसंतर ब्रिजहेड में आगे बढ़ना पड़ा। भ्रम और गोलाबारी के बीच मेजर बल के पास केवल सात टैंक रह गए। इसके बावजूद उन्होंने 3 ग्रेनेडियर्स द्वारा बनाए गए ब्रिजहेड की रक्षा के लिए आगे बढ़ने का फैसला किया।
जरपाल इलाके में उनके सेंटूरियन टैंकों पर पाकिस्तान की ओर से जबरदस्त जवाबी हमला हुआ। संख्या में कम होने के बावजूद मेजर बल ने मोर्चे पर रहते हुए हमले का नेतृत्व किया और कई पैटन टैंकों को नष्ट कर दिया।
‘आप मजाक उड़ा रहे हैं?’—पाकिस्तानी अफसर की प्रतिक्रिया
मेजर बल ने अतिरिक्त सहायता मांगी, जिसके बाद ‘ए’ स्क्वाड्रन से तीन टैंक—जिनमें सेकंड लेफ्टिनेंट खेतरपाल भी शामिल थे—उनकी मदद के लिए पहुंचे। युद्धविराम के कुछ घंटों बाद हुई एक मुलाकात को याद करते हुए ब्रिगेडियर बल ने एनडीटीवी से कहा कि जब उन्होंने पाकिस्तानी स्क्वाड्रन कमांडर से कहा, “आपने अच्छा युद्ध लड़ा,” तो वह चिढ़कर बोला,
“आप मेरा मजाक उड़ा रहे हैं… हमें पता है कि आपने अच्छा युद्ध लड़ा।”
पाकिस्तानी अधिकारी ने बताया कि उसने अपने चारों स्क्वाड्रन कमांडर खो दिए थे और उनके शव तक नहीं मिल सके। उसने अरुण खेतरपाल के टैंक की ओर इशारा करते हुए कहा कि ऐसा साहसिक युद्ध शायद ही कोई लड़ सकता है।
परमवीर और महावीर चक्र से सम्मान
सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। लेफ्टिनेंट कर्नल हनुत सिंह और मेजर अमरजीत सिंह बल को महावीर चक्र प्रदान किया गया। इसके अलावा, 3 ग्रेनेडियर्स के मेजर होशियार सिंह दहिया को भी परमवीर चक्र से नवाजा गया। बसंतर की लड़ाई की तीव्रता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें दो परमवीर चक्र और दो महावीर चक्र प्रदान किए गए।
1965 के युद्ध में भी दिखाया पराक्रम
मेजर बल का साहस 1971 तक सीमित नहीं था। 1965 के युद्ध में, 25 वर्ष की उम्र में, उन्होंने फिल्लौरा, चाविंदा और बटूर डोगरांडी की लड़ाइयों में हिस्सा लिया। पूना हॉर्स को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के रणनीतिक केंद्र चाविंदा के आसपास दुश्मन की बख्तरबंद ताकत को निष्क्रिय करने का मिशन सौंपा गया था। इस दौरान वे लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर तारापोर के साथ ‘कूशब’ नामक कमांड टैंक में तैनात थे।
16 सितंबर 1965 को ‘कूशब’ टैंक पाकिस्तानी गोलाबारी की चपेट में आ गया। मेजर बल के पैर में गंभीर चोट आई और वे नौ महीने से अधिक समय तक अस्पताल में भर्ती रहे। उसी शाम हुए एक अन्य हमले में लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोर शहीद हो गए, जिन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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