जून 2025 बना 12 देशों के इतिहास का सबसे गर्म महीना, एशिया-यूरोप-अफ्रीका में 790 मिलियन लोग गर्मी की चपेट में: UN ने जताई चिंता
जून 2025 पूरी दुनिया के लिए अब तक का सबसे गर्म महीनों में से एक साबित हुआ है। यूरोप, एशिया और अफ्रीका के कई हिस्सों में तापमान ने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए, जिससे अनुमानित 790 मिलियन (79 करोड़) लोग भीषण गर्मी की चपेट में आ गए। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु एजेंसियों ने इस पर गहरी चिंता जताई है, इसे “जलवायु परिवर्तन का गंभीर और प्रत्यक्ष संकेत” करार दिया है।
यूरोप: पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों में रिकॉर्ड स्तर की लू
कोपर्निकस क्लाइमेट मॉनिटरिंग सर्विस के अनुसार, पश्चिमी और दक्षिणी यूरोप — खासतौर पर बेल्जियम, फ्रांस, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड, इटली और बाल्कन देशों — में जून के औसत तापमान से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। गर्म हवाओं और लू के कारण कई इलाकों में हीटवेव अलर्ट जारी किए गए।
एशिया: जापान और चीन में अब तक का सबसे गर्म जून
जापान: 1898 से रिकॉर्ड रखे जाने के बाद यह सबसे गर्म जून रहा। 14 शहरों में ऐतिहासिक तापमान दर्ज हुआ और समुद्री सतह का तापमान भी सामान्य से 1.2 डिग्री अधिक रहा।
चीन: 102 मौसम केंद्रों ने अपने इलाकों का सबसे गर्म जून दर्ज किया। कुछ हिस्सों में तापमान 40°C के पार गया।
कोरियाई प्रायद्वीप: दक्षिण और उत्तर कोरिया दोनों में औसत से 2°C अधिक तापमान दर्ज हुआ।
मध्य एशिया: पाकिस्तान, ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान में गर्मी ने दशकों पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त किए। अप्रैल-जून का मौसम ‘इतिहास का सबसे गर्म वसंत’ रहा।
अफ्रीका: शिक्षा और जीवन प्रभावित, UN ने जताई चिंता
नाइजीरिया, दक्षिण सूडान, इथियोपिया और कांगो जैसे देशों में भीषण गर्मी के कारण सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो गया।
दक्षिण सूडान में औसत तापमान में 2.1 डिग्री की असामान्य बढ़ोतरी दर्ज की गई।
कई स्कूलों में छात्र बेहोश हुए, जिसके चलते प्रशासन को स्कूल बंद करने पड़े।
संयुक्त राष्ट्र की विश्व मौसम विज्ञान संस्था (WMO) ने चेताया है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल तापमान तक सीमित नहीं है — यह अफ्रीका में खाद्य संकट, सुरक्षा, और पलायन जैसी चुनौतियों को और अधिक जटिल बना रहा है।
जलवायु विशेषज्ञों की चेतावनी
जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि 2025 की यह गर्मी एल-नीनो प्रभाव, समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि और ग्रीनहाउस गैसों की रिकॉर्ड मात्रा का संयुक्त परिणाम है। अगर उत्सर्जन पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो भविष्य में इससे भी अधिक चरम परिस्थितियाँ सामने आ सकती हैं।
Comments are closed.