ईरान पर हमले से पहले चीन की नजर, सैटेलाइट से अमेरिकी मूवमेंट कर रहा था ट्रैक

1

पिछले महीने 28 फरवरी को ईरान पर हुए अमेरिका-इजरायल हमले से पहले ही चीन को इसकी भनक लग गई थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहली मिसाइल दागे जाने से पहले ही संकेत मिल गए थे कि अमेरिका क्षेत्र में बड़े सैन्य अभियान की तैयारी कर रहा है।

दरअसल, एक चीनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्टार्टअप MizarVision ने दावा किया है कि वह पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों की लगभग रियल-टाइम और हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरें सार्वजनिक कर रहा था। इन तस्वीरों में अमेरिकी लड़ाकू विमानों की तैनाती से लेकर युद्धपोतों की गतिविधियों तक का विवरण सामने आया।

सैटेलाइट तस्वीरों से खुली सैन्य तैयारियों की जानकारी

इन सैटेलाइट तस्वीरों में Lockheed Martin F‑22 Raptor स्टील्थ फाइटर जेट के सटीक कोऑर्डिनेट्स से लेकर परमाणु ऊर्जा से चलने वाले एयरक्राफ्ट कैरियर के डेक कॉन्फिगरेशन तक की जानकारी दिखाई गई। तस्वीरों में रनवे पर खड़े लड़ाकू विमान, रेगिस्तानी एयरफील्ड पर उतरते ट्रांसपोर्ट प्लेन और सैन्य उपकरणों की तैनाती साफ नजर आ रही थी।

विशेषज्ञों और रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की हाई-रिजॉल्यूशन कमर्शियल सैटेलाइट इमेजरी ने पारंपरिक सैन्य गोपनीयता को काफी हद तक चुनौती दी है, हालांकि कंपनी का कहना है कि उसका डेटा केवल व्यावसायिक उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जाता है।

ऑपरेशन से पहले ट्रैक किए गए अमेरिकी कैरियर

जब कथित सैन्य अभियान ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू हुआ, तो मिजारविजन का दावा है कि उसने अमेरिकी नौसेना के विमानवाहक पोत USS Gerald R. Ford (CVN‑78) और USS Abraham Lincoln (CVN‑72) की गतिविधियों को पहले ही ट्रैक कर लिया था, जब वे पश्चिम एशिया के करीब पहुंच रहे थे।

कंपनी के अनुसार, उसने समुद्री निगरानी जेट्स की उड़ानों को कैरियर की लोकेशन से जोड़ने के लिए फ्लाइट-ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर का भी इस्तेमाल किया था।

ईरानी हमलों से जुड़ी चर्चा

मिजारविजन द्वारा पहचाने गए कई सैन्य ठिकानों को बाद में ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों का निशाना बनाया गया। हालांकि चीन और ईरान के बीच किसी गुप्त डेटा-शेयरिंग या क्लासिफाइड इंटेलिजेंस लिंक का कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है।

विश्लेषकों का कहना है कि कमर्शियल सैटेलाइट टेक्नोलॉजी और एआई-आधारित विश्लेषण ने आधुनिक युद्ध में सूचना की भूमिका को पूरी तरह बदल दिया है, जहां खुले स्रोतों से भी सैन्य गतिविधियों का काफी हद तक पता लगाया जा सकता है।

Comments are closed.