चीनी की बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई चिंता, एथनॉल नीति से अल नीनो तक क्या हैं वजहें?

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देश में चीनी की कीमतों में तेजी को लेकर एथनॉल नीति से लेकर मौसम और गन्ने के घटते उत्पादन तक कई कारणों पर बहस तेज हो गई है।

विपक्ष जहां पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण को चीनी की उपलब्धता और कीमतों से जोड़ रहा है, वहीं सरकार और चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ इसके पीछे कई दूसरे कारणों को भी अहम मान रहे हैं।

केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी के मुताबिक, रेड रॉट बीमारी और अल नीनो के प्रभाव से कम बारिश ने गन्ने की फसल को प्रभावित किया, जिससे उत्पादन घटा और चीनी की उपलब्धता पर असर पड़ा। सरकार ने आगामी त्योहारी सीजन में कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए अस्थायी चीनी आयात समेत कई कदम उठाए हैं।

सरकार का क्या कहना है?

जोशी ने कहा कि अल नीनो के कारण केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ। उनके मुताबिक देश में सालाना करीब 280 लाख टन चीनी की खपत होती है और फिलहाल 20-25 लाख टन का सरप्लस उपलब्ध है।

सरकार का तर्क है कि चीनी की मौजूदा कीमतों को केवल एथनॉल नीति से जोड़ना सही नहीं होगा। मौसम संबंधी परिस्थितियों और गन्ने की कम पैदावार का भी बाजार पर सीधा असर पड़ा है।

विपक्ष ने एथनॉल नीति को घेरा

कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति के कारण गन्ने और चीनी के उत्पादन का संतुलन प्रभावित हुआ। कांग्रेस महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि गन्ना किसानों को भुगतान में देरी से किसानों का इस फसल से मोहभंग हुआ है।

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी आवश्यक खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस गन्ने का इस्तेमाल चीनी उत्पादन में होना चाहिए, उसका एक हिस्सा ईंधन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

घटता गन्ना रकबा भी बड़ी चिंता

महाराष्ट्र के पूर्व गन्ना आयुक्त शेखर गायकवाड़ के मुताबिक, देश में गन्ने की खेती का रकबा और उत्पादन दोनों घटे हैं। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2022-23 में गन्ने का रकबा करीब 59 लाख हेक्टेयर था, जो 2024-25 में घटकर लगभग 54.5 लाख हेक्टेयर रह गया।

इसी अवधि में गन्ने का उत्पादन करीब 49 करोड़ टन से घटकर 45.3 करोड़ टन रह गया। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसका असर आगे चलकर चीनी की उपलब्धता पर पड़ना स्वाभाविक है।

गायकवाड़ का कहना है कि गन्ने और चीनी का उत्पादन बढ़ाने के लिए बनाई गई किसी भी नई नीति का असर तुरंत नहीं दिखेगा। इसमें कम से कम तीन साल लग सकते हैं। इसलिए सरकार को उत्पादन और उपलब्ध स्टॉक पर लगातार नजर रखनी होगी।

छोटा हुआ चीनी मिलों का पेराई सत्र

कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज की नेशनल फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष जयप्रकाश दांडेगांवकर ने महाराष्ट्र में चीनी मिलों के घटते पेराई सत्र को भी एक वजह बताया। उनके अनुसार, जिन मिलों में पहले करीब 150 दिन तक पेराई होती थी, वहां अब यह अवधि घटकर करीब 100 दिन रह गई है।

उन्होंने कहा कि गन्ने का एफआरपी और चीनी की बिक्री कीमत मिलों पर आर्थिक दबाव डालती है। हालांकि एफआरपी और चीनी के एमएसपी की अलग-अलग इकाइयों के कारण दोनों की सीधे तुलना सावधानी से की जानी चाहिए।

‘एथनॉल चीनी महंगाई की मुख्य वजह नहीं’

पश्चिम भारत चीनी मिल संघ के अध्यक्ष भैरवनाथ थोंब्रे ने चीनी की महंगाई के लिए एथनॉल को मुख्य कारण मानने से इनकार किया। उनके मुताबिक, अब एथनॉल उत्पादन में अनाज की हिस्सेदारी पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है।

उन्होंने बताया कि शुरुआत में देश में करीब 390 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया गया था, लेकिन वास्तविक उत्पादन लगभग 310 लाख टन रहा। यानी अनुमान से करीब 80 लाख टन कम उत्पादन हुआ। इसके बावजूद करीब आठ लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी गई, जिससे घरेलू बाजार में उपलब्धता पर दबाव बढ़ा।

थोंब्रे के मुताबिक, मौसम को लेकर आशंकाओं के बीच व्यापारियों ने भी बड़ी मात्रा में चीनी खरीदकर स्टॉक किया, जिससे कीमतों में तेजी को और बल मिला। अब सरकार ने चीनी की बिक्री और स्टॉक की निगरानी से जुड़े कुछ नियम लागू किए हैं।

कई कारण मिलकर बढ़ा रहे कीमत

चीनी की मौजूदा महंगाई को लेकर उपलब्ध तर्कों से साफ है कि इसके पीछे एक नहीं, बल्कि कई वजहें हैं। गन्ने का घटता रकबा और उत्पादन, मौसम का असर, छोटा होता पेराई सत्र, घरेलू मांग, निर्यात और बाजार में स्टॉकिंग जैसे कारक कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं। एथनॉल नीति पर राजनीतिक बहस जारी है, लेकिन उद्योग विशेषज्ञ इसे मौजूदा तेजी की अकेली या मुख्य वजह नहीं मानते।

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