दिल्ली में वायु संकट गहराया: 23 साल में पीएम-2.5 स्तर और बढ़ा, हालात चिंताजनक

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दिल्ली की हवा को लेकर लगातार दावे किए जाते रहे हैं कि हालात सुधर रहे हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि पिछले 23 वर्षों में वायु प्रदूषण का संकट जस का तस बना हुआ है।

मानसून के महीनों में भले ही राजधानी की हवा कुछ साफ दिखाई देती हो, लेकिन सालाना स्तर पर प्रदूषण की स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ है।

23 साल का रिकॉर्ड: पीएम-2.5 ऊंचा ही रहा

शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट की एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स (AQLI) रिपोर्ट के मुताबिक 1998 से 2023 तक दिल्ली में पीएम-2.5 का स्तर लगातार खतरनाक रहा।

2010-11 और 2015-16 प्रदूषण के लिहाज से सबसे खराब साल दर्ज हुए।

रिपोर्ट बताती है कि इतने लंबे समय के बावजूद दिल्लीवासियों की औसत जीवन प्रत्याशा पर सकारात्मक असर नहीं पड़ा।

एन्वायरोकैटेलिस्ट के मुख्य विश्लेषक सुनील दहिया का कहना है कि दिल्ली की भौगोलिक स्थिति और वायु प्रसार क्षमता कम होने से प्रदूषण और गंभीर हो जाता है। साथ ही, पड़ोसी राज्यों से आने वाला उत्सर्जन भी राजधानी की हवा बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभाता है। उनका मानना है कि पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और 300–400 किमी के दायरे में प्रदूषण नियंत्रण के उपाय जरूरी हैं।

आईआईटी कानपुर के कोटक स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी के डीन प्रो. एस.एन. त्रिपाठी का कहना है कि प्रदूषण से निपटने के लिए शहरी ढांचे में सुधार अहम है। खासकर पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत बनाकर निजी वाहनों पर निर्भरता घटानी होगी। राइड-शेयरिंग और बेहतर कनेक्टिविटी जैसी नीतियां ट्रैफिक कम कर सकती हैं और वायु गुणवत्ता सुधार में मददगार होंगी।

1998 से 2023 तक पीएम-2.5 और जीवन प्रत्याशा (चयनित वर्ष)

1998: पीएम-2.5 स्तर 56.3, जीवन प्रत्याशा में कमी 5.0 वर्ष

2003: पीएम-2.5 स्तर 78.4, कमी 7.2 वर्ष

2010: पीएम-2.5 स्तर 100.6, कमी 9.3 वर्ष

2015: पीएम-2.5 स्तर 100.8, कमी 9.4 वर्ष

2023: पीएम-2.5 स्तर 88.3, कमी 8.1 वर्ष

डेटा साफ दिखाता है कि दिल्ली की हवा में सुधार के बजाय प्रदूषण लंबे समय में और बढ़ा है। मौसमी बदलाव भले ही थोड़ी राहत देते हों, लेकिन लगातार और ठोस कदम उठाए बिना हवा को साफ करना मुश्किल है।

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