ईरान-इजरायल युद्ध 28 फरवरी से लगातार जारी है और अब इसका असर मिडिल ईस्ट से निकलकर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है।
तीन हफ्तों के भीतर ऊर्जा सप्लाई, शिपिंग रूट्स और ट्रांसपोर्ट लागत पर भारी दबाव बन गया है, जिससे कई देशों में महंगाई बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर असर
वैश्विक तेल और गैस सप्लाई का बड़ा हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरता है, लेकिन युद्ध के चलते यहां जहाजों की आवाजाही तेजी से घटी है। फरवरी के अंत तक जहां रोजाना औसतन 100 से ज्यादा जहाज गुजर रहे थे, वहीं मार्च की शुरुआत में यह संख्या गिरकर बेहद कम स्तर पर आ गई। यह गिरावट वैश्विक सप्लाई चेन के लिए गंभीर चिंता का संकेत है।
तेल और गैस की कीमतों में उछाल
ऊर्जा सप्लाई में आई इस बाधा का सीधा असर बाजार पर पड़ा है। प्राकृतिक गैस की कीमतों में लगभग 10% तक बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि कच्चे तेल के दाम भी ऊपर की ओर बने हुए हैं। इससे दुनिया भर में ईंधन महंगा होने लगा है।
कई देशों में पेट्रोल-डीजल महंगे
23 फरवरी से 16 मार्च के बीच कई देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया। ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, सिंगापुर और स्पेन जैसे देशों में ईंधन काफी महंगा हुआ, जबकि भारत और ब्राजील में सरकारी नियंत्रण के कारण कीमतों में स्थिरता बनी रही।
डीजल की कीमतों में भी इसी अवधि में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई, खासकर विकसित और आयात-निर्भर देशों में।
LPG कीमतों में भारी अंतर
LPG की कीमतों में देशों के बीच बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। आयात पर निर्भर देशों में दाम ज्यादा हैं, जबकि तेल उत्पादक देशों में अपेक्षाकृत कम कीमत बनी हुई है। भारत इस मामले में मध्यम स्तर पर है, जहां कीमतें न तो सबसे ज्यादा हैं और न ही सबसे कम।
एयरलाइंस पर दबाव, टिकट हो सकते हैं महंगे
जेट फ्यूल महंगा होने से एविएशन सेक्टर भी प्रभावित हुआ है। कई एयरलाइंस ने फ्यूल सरचार्ज बढ़ा दिया है, जिससे यात्रियों के लिए टिकट महंगे होने लगे हैं। अगर ईंधन की कीमतें और बढ़ती हैं, तो आने वाले समय में हवाई यात्रा और महंगी हो सकती है।
आगे क्या असर पड़ सकता है
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो इसका असर सिर्फ ऊर्जा तक सीमित नहीं रहेगा। ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ने से सामान महंगे होंगे, सप्लाई चेन प्रभावित होगी और वैश्विक स्तर पर महंगाई का दबाव बढ़ेगा।
कुल मिलाकर, यह संघर्ष अब सिर्फ क्षेत्रीय नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला संकट बनता जा रहा है।
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