सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राज्यों में कार्यरत Real Estate Regulatory Authority (रेरा) की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि यह संस्था घर खरीदारों को प्रभावी राहत नहीं दे पा रही, तो इसके अस्तित्व पर पुनर्विचार करना चाहिए। अदालत ने कहा कि रेरा का उद्देश्य जिन लोगों की सुरक्षा था, वही आज निराश और हताश नजर आ रहे हैं।
प्रधान न्यायाधीश Surya Kant और जस्टिस Joymalya Bagchi की पीठ हिमाचल प्रदेश में रेरा कार्यालय को शिमला से धर्मशाला स्थानांतरित करने के मामले की सुनवाई कर रही थी। अदालत ने राज्य सरकार को अपनी पसंद के स्थान पर कार्यालय स्थानांतरित करने की अनुमति दी, हालांकि इसे हाई कोर्ट में लंबित याचिका के अंतिम निर्णय पर निर्भर बताया।
इससे पहले Himachal Pradesh High Court ने जून 2025 की अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगाई थी और बाद में दिसंबर 2025 में भी उस रोक को जारी रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने उस निर्देश पर रोक लगा दी। राज्य सरकार ने दलील दी कि शिमला में भीड़ कम करने और प्रशासनिक संतुलन के लिए कार्यालय को धर्मशाला शिफ्ट करने का फैसला लिया गया है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि कई राज्यों में रेरा “सेवानिवृत्त अधिकारियों के पुनर्वास केंद्र” की तरह काम कर रहा है। जब पीठ को बताया गया कि रेरा में एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी नियुक्त हैं, तो अदालत ने सवाल उठाया कि क्या इस तरह की नियुक्तियां संस्था के मूल उद्देश्य को पूरा कर पा रही हैं।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि रेरा आदेशों के खिलाफ अपील की सुनवाई की शक्ति शिमला के प्रधान जिला जज से धर्मशाला के प्रधान जिला जज को स्थानांतरित की जाए, ताकि प्रभावित पक्षों को सुविधा हो।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी रेरा की कार्यप्रणाली पर असंतोष जता चुका है। सितंबर 2024 में ‘भारती जगत जोशी बनाम भारतीय रिजर्व बैंक’ मामले में अदालत ने कहा था कि कई जगहों पर रेरा अपने मूल उद्देश्यों से भटक गया है। वहीं 2022 में मॉडल बिल्डर-बायर एग्रीमेंट से जुड़े मामले में केंद्र सरकार से राज्यों के नियमों की समीक्षा करने को कहा गया था।
अदालत की ताजा टिप्पणियों से स्पष्ट है कि रियल एस्टेट क्षेत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाली इस संस्था की कार्यक्षमता पर सर्वोच्च न्यायालय गंभीर सवाल उठा रहा है।
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