उत्तराखंड में 11 सालों का आपदा रिकॉर्ड: 5,830 भूस्खलन और 14,237 बाढ़-अतिवृष्टि घटनाएं दर्ज

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उत्तराखंड: 11 सालों में 27,000 से अधिक प्राकृतिक आपदाएं, 3,800 से ज्यादा मौतें।

उत्तराखंड में हर साल मानसून के दौरान प्राकृतिक आपदाएं भारी तबाही मचाती हैं। बुनियादी ढांचे की क्षति तो समय के साथ सुधारी जा सकती है, लेकिन इन हादसों में गई हजारों जानें कभी वापस नहीं आ सकतीं। उत्तराखंड स्टेट डिज़ास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (USDMA) के अनुसार, वर्ष 2015 से 2025 तक राज्य में 27,197 आपदाजनक घटनाएं दर्ज हुई हैं। इनमें 14,237 अतिवृष्टि/त्वरित बाढ़ और 5,830 भूस्खलन शामिल हैं।

इन्हीं घटनाओं में पिछले 11 वर्षों में 3,839 लोगों की मौत, 6,207 घायल और 312 लोग लापता हुए। केवल 2025 (20 सितंबर तक) में ही राज्य में 2,199 घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 260 मौतें और 566 लोग घायल हुए।

वर्षवार आंकड़ों में 2018 और 2023 सबसे भयावह रहे, जब क्रमशः 5,056 और 4,990 घटनाएं दर्ज हुईं। 2018 में 720 और 2023 में 497 लोगों की मौत हुई। 2021 और 2022 में भी आपदाओं ने गंभीर रूप से असर डाला।

हालांकि इन आँकड़ों में जून 2013 की केदारनाथ आपदा शामिल नहीं है, जिसमें अकेले 4,400 से अधिक लोग मारे गए या लापता हुए थे।

सबसे ज्यादा प्रभावित जिले पिथौरागढ़, चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, टिहरी और चंपावत रहे हैं।

आपदाओं में वृद्धि के कारण
विशेषज्ञों के अनुसार राज्य में बड़े पैमाने पर सड़क और जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और भूमि उपयोग में बदलाव ने आपदा जोखिम बढ़ाया है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन से मौसमी चक्र असामान्य हो गए हैं—समय पर बारिश या बर्फबारी नहीं होने और मानसून में अचानक भारी वर्षा से भूस्खलन व बाढ़ की घटनाएं तेज़ी से बढ़ रही हैं।

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