दहेज कुप्रथा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: ‘यह समाज का अभिशाप, मौजूदा कानून नाकाफी’

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दहेज उन्मूलन संवैधानिक और सामाजिक आवश्यकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दहेज प्रथा को “समाज में गहराई तक फैला अभिशाप” बताते हुए कहा कि इसका उन्मूलन एक अत्यावश्यक संवैधानिक और सामाजिक आवश्यकता है। अदालत ने टिप्पणी की कि मौजूदा कानून न केवल कई मामलों में अप्रभावी साबित हो रहे हैं, बल्कि उनके दुरुपयोग की समस्या भी सामने आई है, इसके बावजूद दहेज जैसी बुराई आज भी व्यापक रूप से प्रचलित है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि समाज की सोच में बुनियादी बदलाव जरूरी है। भावी पीढ़ी को विवाह में समानता, गरिमा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति संवेदनशील बनाना समय की मांग है। इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उन्मूलन के लिए विस्तृत और व्यापक दिशानिर्देश जारी किए।

मामले की पृष्ठभूमि

ये टिप्पणियां उस मामले की सुनवाई के दौरान की गईं, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज मृत्यु और क्रूरता के आरोपों से अभियुक्तों को बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि महज 20 वर्ष की एक युवती को इसलिए अपनी जान गंवानी पड़ी क्योंकि उसके माता-पिता दहेज की मांगें पूरी नहीं कर सके।

पीठ ने कहा कि एक जवान लड़की, जिसकी उम्र मुश्किल से 20 साल थी, को बेहद दर्दनाक और भयावह तरीके से मौत के घाट उतार दिया गया। अदालत ने दुख जताते हुए कहा कि उसकी “कीमत” एक रंगीन टीवी, एक मोटरसाइकिल और 15,000 रुपये लगाई गई।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश

शैक्षणिक पाठ्यक्रम में बदलाव: केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश कि स्कूल और कॉलेज स्तर पर पाठ्यक्रम में ऐसे बदलाव किए जाएं, जिससे यह स्पष्ट संदेश जाए कि विवाह में दोनों पक्ष समान हैं और कोई भी दूसरे के अधीन नहीं है।

दहेज निषेध अधिकारियों की नियुक्ति: सभी राज्यों में दहेज निषेध अधिकारियों की प्रभावी नियुक्ति सुनिश्चित की जाए। उनके नाम, फोन नंबर और ई-मेल जैसी जानकारी स्थानीय स्तर पर व्यापक रूप से प्रचारित की जाए।

पुलिस और न्यायिक अधिकारियों का प्रशिक्षण: दहेज मृत्यु और क्रूरता के मामलों में सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझने के लिए नियमित प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि वास्तविक और झूठे या दुरुपयोग वाले मामलों में अंतर किया जा सके।

लंबित मामलों का शीघ्र निपटारा: सभी हाईकोर्ट्स को IPC की धारा 304-B (दहेज मृत्यु) और 498-A (दहेज प्रताड़ना) से जुड़े लंबित मामलों की समीक्षा कर त्वरित निपटारे के निर्देश दिए गए।

जमीनी स्तर पर जागरूकता: जिला प्रशासन और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को सिविल सोसायटी और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर नियमित जागरूकता कार्यक्रम और कार्यशालाएं आयोजित करने को कहा गया।

मामले का विवरण

नासरीन की शादी अजमल बेग से हुई थी। आरोप था कि शादी के बाद पति और उसके परिवार ने रंगीन टीवी, मोटरसाइकिल और 15,000 रुपये की लगातार मांग की। वर्ष 2001 में नासरीन पर केरोसिन डालकर उसे जला दिया गया, जिससे उसकी मौत हो गई।

ट्रायल कोर्ट ने पति और सास को IPC की धारा 304-B, 498-A और दहेज निषेध अधिनियम के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2003 में दोनों को बरी कर दिया।

राज्य सरकार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए पति की उम्रकैद की सजा बहाल कर दी। 94 वर्षीय सास को वृद्धावस्था के कारण जेल भेजने से छूट दी गई। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दहेज की मांग शादी से पहले हो या बाद में, कानून में कोई भेद नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति सभी हाईकोर्ट्स के मुख्य न्यायाधीशों और राज्यों के मुख्य सचिवों को भेजने के निर्देश दिए हैं। इस मामले में अनुपालन रिपोर्ट चार सप्ताह के भीतर दाखिल की जाएगी।

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