नेपाल में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और पारंपरिक राजनीति के खिलाफ उभरे युवा आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे बने बालेन्द्र शाह उर्फ बालेन अब खुद सवालों के घेरे में हैं।
सत्ता संभालने के महज दो महीने बाद ही उनकी सरकार पर वादों से पीछे हटने, विवादित फैसले लेने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अनदेखी के आरोप लगने लगे हैं।
35 वर्षीय रैपर से राजनेता बने बालेन शाह ने मार्च 2026 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद खुद को नई पीढ़ी की राजनीति का प्रतीक बताया था। युवाओं ने उन्हें पुराने राजनीतिक ढांचे के विकल्प के रूप में देखा था। लेकिन अब उनकी सरकार के कई फैसले विवादों में हैं और विपक्ष के साथ-साथ आम लोगों के बीच भी सवाल उठ रहे हैं।
नेपाल में पिछले साल बड़े पैमाने पर हुए युवा विरोध प्रदर्शनों ने तत्कालीन सरकार पर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और बेरोजगारी के आरोप लगाए थे। इन्हीं आंदोलनों के बाद राजनीतिक बदलाव का माहौल बना और चुनाव में बालेन शाह को भारी समर्थन मिला। सोशल मीडिया पर लोकप्रिय बालेन ने खुद को सिस्टम बदलने वाले नेता के रूप में पेश किया था।
प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने 100 बिंदुओं वाला प्रशासनिक सुधार एजेंडा पेश किया। इसमें मंत्रालयों की संख्या कम करने, घाटे वाले बोर्ड और समितियों के विलय, सरकारी सेवाओं के डिजिटलीकरण और शिक्षा व नौकरशाही को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने जैसे बड़े वादे शामिल थे। हालांकि सरकारी प्रगति ट्रैकर में कई योजनाएं तय समय से पीछे चलती दिखाई दे रही हैं।
सरकार को शुरुआती झटके कैबिनेट विवादों से भी लगे। श्रम मंत्री दीपक साह को कथित नियुक्ति विवाद के बाद पद छोड़ना पड़ा, जबकि गृह मंत्री सुदन गुरूंग ने कारोबारी संबंधों के आरोपों के बाद इस्तीफा दे दिया। इसके बाद सरकार की टीम चयन क्षमता पर भी सवाल उठने लगे।
बालेन सरकार के कई अध्यादेश भी विवाद का कारण बने। सरकार ने सरकारी कर्मचारी यूनियनों को खत्म करने, विश्वविद्यालयों में छात्र संगठनों पर रोक लगाने और शिक्षा व नौकरशाही से राजनीतिक दलों का प्रभाव हटाने जैसे कदम उठाने की कोशिश की। हालांकि नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने इन अध्यादेशों पर रोक लगा दी।
सरकार की बुलडोजर कार्रवाई भी बड़े विवाद में रही। अवैध कब्जों और बस्तियों को हटाने के अभियान के दौरान काठमांडू घाटी समेत कई इलाकों में हजारों ढांचे तोड़े गए। मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया कि विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए कोई स्पष्ट योजना नहीं बनाई गई। विरोध प्रदर्शनों में सरकार के खिलाफ नारेबाजी भी हुई।
वहीं संसद से दूरी को लेकर भी बालेन शाह विपक्ष के निशाने पर हैं। आरोप है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने सार्वजनिक संवाद सीमित कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि वे संसद की बैठकों में कम शामिल होते हैं और सवालों से बचते हैं। यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी के कुछ नेताओं ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है।
भारत-नेपाल सीमा पर लागू किए गए नए कस्टम नियमों ने भी सरकार को विवादों में ला दिया है। नेपाल सरकार ने 100 नेपाली रुपये से अधिक मूल्य के भारतीय सामान पर अनिवार्य कस्टम ड्यूटी लागू की है। सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों का कहना है कि इससे रोजमर्रा के सामान की खरीद मुश्किल हो गई है और स्थानीय व्यापार प्रभावित हुआ है।
बालेन शाह के समर्थकों का कहना है कि वे पारंपरिक नेताओं की तरह भाषण देने के बजाय जमीन पर काम करने में विश्वास रखते हैं। वहीं आलोचकों का आरोप है कि तेजी से फैसले लेने की कोशिश में सरकार कानूनी प्रक्रियाओं और लोकतांत्रिक जवाबदेही की अनदेखी कर रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेपाल में बदलाव की उम्मीद जगाने वाले बालेन शाह युवाओं का भरोसा बनाए रख पाएंगे या उनकी सरकार भी पारंपरिक राजनीति के उसी दबाव में घिरती जा रही है, जिसके खिलाफ उन्होंने अभियान शुरू किया था।
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