NPT सम्मेलन बेनतीजा खत्म, परमाणु हथियार मुक्त दुनिया पर वैश्विक सहमति फिर नाकाम

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दुनिया को परमाणु हथियारों के खतरे से मुक्त बनाने की दिशा में एक और बड़ी वैश्विक कोशिश नाकाम साबित हुई।

संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में 27 अप्रैल से 22 मई तक चला ‘परमाणु अप्रसार संधि’ (NPT) का 11वां समीक्षा सम्मेलन बिना किसी साझा सहमति और अंतिम परिणाम दस्तावेज के समाप्त हो गया।

करीब चार सप्ताह तक चली गहन चर्चाओं के बावजूद सदस्य देश किसी साझा निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके। सम्मेलन के अध्यक्ष और संयुक्त राष्ट्र में वियतनाम के स्थायी प्रतिनिधि दो हुंग वियत ने इसे लेकर गहरी निराशा जताई।

उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि दुनिया को अधिक सुरक्षित बनाने का यह एक महत्वपूर्ण अवसर था, लेकिन सदस्य देश साझा दस्तावेज पर सहमति बनाने में असफल रहे। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों पर देशों के बीच गंभीर और व्यावहारिक चर्चा हुई।

वैश्विक तनाव के बीच हुआ सम्मेलन

यह सम्मेलन ऐसे समय आयोजित हुआ जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने सम्मेलन में सहमति बनने की संभावनाओं को कमजोर कर दिया।

सम्मेलन अध्यक्ष ने चेतावनी दी कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय माहौल गहरे अविश्वास, बढ़ते सैन्य तनाव और परमाणु जोखिमों से घिरा हुआ है। ऐसे समय में मजबूत और सामूहिक कदमों की जरूरत थी, लेकिन साझा परिणाम सामने नहीं आ सका।

NPT पर बढ़ी चिंता

साल 1970 में लागू हुई परमाणु अप्रसार संधि (NPT) को वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण और कानूनी रूप से बाध्यकारी बहुपक्षीय संधियों में माना जाता है। इस संधि से अब तक 191 देश जुड़ चुके हैं।

हर पांच वर्ष में आयोजित होने वाले इस समीक्षा सम्मेलन का उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना, निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करना होता है।

रूस ने अमेरिका पर लगाए आरोप

सम्मेलन के निष्कर्षहीन समाप्त होने के बाद रूस ने इसकी विफलता के लिए अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को जिम्मेदार ठहराया। रूस के विदेश मंत्रालय का कहना है कि अमेरिका के कड़े रुख और कुछ मुद्दों पर लचीलेपन की कमी के कारण अंतिम दस्तावेज पर सहमति नहीं बन सकी।

रूस के अनुसार, अध्यक्ष दो हुंग वियत और कई देशों के प्रयासों से एक ऐसा मसौदा तैयार किया गया था जिस पर व्यापक सहमति बन सकती थी, लेकिन अंतिम समय में मतभेद दूर नहीं हो पाए।

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